ओणम नॉन हिंदू है?

ओणम नॉन हिंदू है?

📅 August 25, 2026 🏷️ India/Culture ✍️ NewsTime Editorial
केरल में ओणम का त्योहार बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। घरों में फूलों की पोक्कलम बनाई जाती है, पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है, नावों की दौड़ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और अलग-अलग समुदायों के लोग इस उत्सव में हिस्सा लेते हैं। यही वजह है कि ओणम को केरल की साझा सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि, हर साल ओणम के दौरान सोशल मीडिया पर इसकी धार्मिक पहचान को लेकर एक नई बहस शुरू हो जाती है। कुछ लोग इसे मुख्य रूप से मलयाली संस्कृति और फसल से जुड़ा त्योहार बताते हैं, जबकि दूसरे लोग इसकी पौराणिक कथाओं, मंदिर परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए इसे हिंदू परंपरा से जुड़ा त्योहार मानते हैं। ओणम की सबसे प्रसिद्ध मान्यता राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार महाबली एक शक्तिशाली राजा थे और उनके शासन में प्रजा खुशहाल थी। कहा जाता है कि उनके राज्य में भेदभाव और गरीबी बहुत कम थी। देवताओं को महाबली की बढ़ती शक्ति की चिंता हुई और भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। वामन एक छोटे ब्राह्मण के रूप में महाबली के पास पहुंचे और उनसे तीन कदम जमीन दान में मांगी। महाबली ने अपना वचन स्वीकार किया। इसके बाद वामन ने विराट रूप धारण कर पहले दो कदमों में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। तीसरे कदम के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा तो महाबली ने अपना सिर आगे कर दिया। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक भेज दिया, लेकिन महाबली को यह वरदान मिला कि वह हर साल एक बार अपनी प्रजा से मिलने के लिए लौट सकेंगे। इसी मान्यता को ओणम से जोड़ा जाता है। ओणम के प्रमुख दिन थिरुवोणम नक्षत्र से जुड़े हैं और केरल के त्रिक्काकरा मंदिर की परंपरा भी वामन और महाबली की कथा से संबंधित मानी जाती है। त्योहार के दौरान बनाए जाने वाले पोक्कलम, दीप प्रज्वलन, ओणाथप्पन की स्थापना और पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को भी केरल की पुरानी परंपराओं का हिस्सा माना जाता है। हालांकि, आधुनिक समय में ओणम की पहचान केवल धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं रही है। केरल में यह एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है, जिसमें विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग भाग लेते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों और दूसरे संस्थानों में ओणम के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पोक्कलम प्रतियोगिता, ओणम सद्या, पारंपरिक खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस त्योहार को एक साझा उत्सव का रूप देते हैं। इसी वजह से कई लोग ओणम को मलयाली संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक मानते हैं। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि यदि किसी त्योहार में अलग-अलग समुदायों के लोग शामिल होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उसकी मूल धार्मिक या पौराणिक पहचान को पूरी तरह अलग कर दिया जाए। इसी बहस में महाबली की कथा की अलग-अलग व्याख्याएं भी सामने आती हैं। कुछ आधुनिक व्याख्याओं में महाबली को सामाजिक समानता और न्याय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जबकि कुछ लोग इस कथा को जातीय या सामाजिक संघर्ष के संदर्भ में समझाते हैं। दूसरी ओर पारंपरिक मान्यता में महाबली को विष्णु का भक्त और अपने वचन को निभाने वाला राजा माना जाता है। ओणम की पहचान को लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण अलग-अलग होने के बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि त्योहार ने समय के साथ कई रूप अपनाए हैं। केरल में हिंदू परिवार इसे धार्मिक आस्था के साथ मनाते हैं, जबकि कई मुस्लिम और ईसाई परिवार इसे अपनी क्षेत्रीय और सामाजिक संस्कृति का हिस्सा मानकर उत्सव में शामिल होते हैं। कुछ धार्मिक संगठनों की ओर से अपने समुदाय के लोगों को ओणम में शामिल होने को लेकर अलग-अलग सलाह भी दी जाती रही है। इसके बावजूद आम जनजीवन में ओणम को अक्सर भाईचारे, खुशी और सामुदायिक मेलजोल के अवसर के रूप में देखा जाता है। इस पूरे विवाद का एक बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी त्योहार का साझा रूप उसकी मूल पहचान को खत्म करता है या फिर उसकी लोकप्रियता और सांस्कृतिक विस्तार को दर्शाता है। ओणम के मामले में धार्मिक कथा, कृषि परंपरा और मलयाली संस्कृति तीनों पहलू एक साथ दिखाई देते हैं। यही वजह है कि इसे केवल एक ही नजरिए से समझना आसान नहीं है। महाबली और वामन की कथा इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है, जबकि फसल, पारंपरिक भोजन, फूलों की सजावट, नाव दौड़ और सांस्कृतिक कार्यक्रम इसे व्यापक सामाजिक उत्सव बनाते हैं। इसलिए ओणम को लेकर जारी बहस में ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अलग-अलग समुदायों का किसी त्योहार में शामिल होना सामाजिक सद्भाव का उदाहरण हो सकता है, लेकिन इसके साथ उस त्योहार की पारंपरिक मान्यताओं और इतिहास को समझना भी उतना ही जरूरी है। ओणम की खासियत यही है कि इसमें धार्मिक आस्था, लोक परंपरा, कृषि संस्कृति और सामुदायिक उत्सव के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं।

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