हस्तिनापुर छोड़ वन गईं माता सत्यवती
महारानी कुंती और गांधारी भी पांडु और माद्री के निधन से बेहद दुखी थीं। कई बार दुख इतना बढ़ जाता कि उन्हें भोजन करने की इच्छा भी नहीं होती थी। अपनी मां को दुखी देखकर पांचों पांडव भी उनके आसपास ही रहते और पिता की याद में व्याकुल होते थे। पितामह भीष्म भी अपने कक्ष में ही रहते थे, जबकि सत्यवती, अंबिका और अंबालिका की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं लेते थे।
इसी दौरान महर्षि व्यास ने माता सत्यवती को भविष्य में आने वाले कठिन समय के बारे में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि सुख के दिन अब बीत चुके हैं और आने वाला समय बेहद कठिन होने वाला है। संसार में छल-कपट बढ़ेगा और धर्म, सदाचार तथा अच्छे आचरण का प्रभाव कम होता जाएगा।
महर्षि व्यास ने सत्यवती को यह भी बताया कि दुर्योधन और अन्य कौरवों के अन्याय के कारण कुरुवंश के अनेक वीरों और संबंधियों का विनाश होने वाला है। उन्होंने सत्यवती को सलाह दी कि वह महल के मोह को छोड़कर योग और संन्यास का मार्ग अपनाएं और तपोवन में जाकर जीवन बिताएं। व्यास ने कहा कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं और भविष्य में होने वाले कुल के विनाश को वह अपनी आंखों से नहीं देख पाएंगे, लेकिन सत्यवती को सब कुछ अपनी आंखों के सामने देखना पड़ेगा।
व्यास की बातें सुनकर माता सत्यवती को जैसे भविष्य की गंभीरता का एहसास हुआ। वह अपनी बहुओं के पास पहुंचीं और अंबिका को पूरी बात बताई। उन्होंने कहा कि व्यास के अनुसार दुर्योधन के अन्याय के कारण भरतवंश के अनेक वीर और सगे-संबंधी नष्ट हो जाएंगे। सत्यवती ने अंबिका से पूछा कि यदि वह उचित समझे तो पुत्रशोक में डूबी अंबालिका को साथ लेकर वह वन चली जाएं।
अंबिका ने भी सत्यवती के साथ वन जाने की इच्छा जताई। उसने कहा कि अगर सत्यवती ने महल छोड़कर वन जाने का निर्णय लिया है तो उसे भी साथ ले चलें। इसके बाद सत्यवती ने पितामह भीष्म से अनुमति ली और अपनी दोनों बहुओं अंबिका तथा अंबालिका को साथ लेकर हस्तिनापुर छोड़ दिया। तीनों ने महर्षि व्यास की सलाह के अनुसार वन में जाकर तपस्या का जीवन अपनाया।
महर्षि वैशंपायन ने राजा जन्मेजय को बताया कि सत्यवती, अंबिका और अंबालिका तीनों वन में रहकर घोर तपस्या करने लगीं। बाद में उन्होंने वहीं शरीर त्याग दिया और अपने अभीष्ट लोक को प्राप्त हुईं।
दूसरी ओर हस्तिनापुर में समय बीतता गया और परिस्थितियां धीरे-धीरे वैसी ही बनने लगीं, जैसी महर्षि व्यास ने पहले चेतावनी दी थी। राजपरिवार के भीतर तनाव, अन्याय और भविष्य में होने वाले संघर्षों की भूमिका तैयार होने लगी थी।
माता सत्यवती का हस्तिनापुर छोड़कर वन जाना महाभारत की कथा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। यह घटना केवल एक राजपरिवार की महिला के संन्यास लेने की कहानी नहीं है, बल्कि उस समय के बदलते राजनीतिक और नैतिक वातावरण की ओर भी संकेत करती है। सत्यवती ने अपने परिवार के भविष्य में आने वाले विनाश की आशंका को समझते हुए राजमहल के मोह से दूर तपस्या का मार्ग चुना।