उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी और राष्ट्रीय मंत्री जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी नियुक्त किया है। तावड़े के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले की काट तलाशना है। बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अमित शाह को यूपी की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने यहां बड़ा राजनीतिक बदलाव किया था। उस समय बीजेपी ने सामाजिक समीकरणों को साधते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी। अब करीब एक दशक बाद पार्टी को एक बार फिर ऐसे रणनीतिकार की जरूरत है जो बदल चुके सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच संगठन को मजबूत कर सके। इसी वजह से विनोद तावड़े को यूपी की कमान दी गई है। तावड़े इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव में अपने माइक्रो मैनेजमेंट और चुनावी रणनीति के लिए चर्चा में रहे हैं। जटिल जातीय समीकरणों वाले बिहार में संगठन और सीट बंटवारे से जुड़े मामलों को संभालने में उनकी भूमिका अहम मानी गई। अब यही अनुभव उत्तर प्रदेश में बीजेपी के काम आ सकता है। यूपी में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती 2024 के लोकसभा चुनाव में कमजोर पड़े सामाजिक समीकरणों को दोबारा मजबूत करना है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने PDA फॉर्मूले के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की और इसका असर चुनावी नतीजों में भी दिखाई दिया। ऐसे में तावड़े के सामने बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं को दोबारा पार्टी के साथ जोड़ने की चुनौती होगी। महाराष्ट्र से आने वाले विनोद तावड़े को संगठन और बूथ स्तर के प्रबंधन में माहिर माना जाता है। उनका राजनीतिक अंदाज आक्रामक बयानों के बजाय संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर रणनीति तैयार करने पर आधारित रहा है। तावड़े का संघ और एबीवीपी से जुड़ा संगठनात्मक अनुभव भी बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूपी जैसे 403 विधानसभा सीटों वाले बड़े राज्य में सिर्फ बड़ी रैलियों और चुनावी नारों के जरिए जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। तावड़े को बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, टिकट वितरण में संतुलन बनाने, जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने तथा पार्टी के अंदरूनी मतभेदों को संभालने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्य संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना भी उनके लिए अहम जिम्मेदारी होगी। बीजेपी के सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। निषाद पार्टी, अपना दल एस, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और आरएलडी जैसे सहयोगियों के साथ तालमेल बनाकर चुनावी रणनीति तैयार करना तावड़े की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है। बिहार में सीट बंटवारे को संभालने के अनुभव के कारण पार्टी को उम्मीद है कि वह यूपी में भी सहयोगी दलों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित कर पाएंगे। बीजेपी के सामने अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में अपनी कमजोर हुई पकड़ को दोबारा मजबूत करने की चुनौती भी है। सत्ता में लंबे समय से रहने के कारण कई इलाकों में स्थानीय विधायकों और नेताओं के खिलाफ नाराजगी की स्थिति बन सकती है। ऐसे में टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व को लेकर सही संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। दूसरी तरफ अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी PDA के जरिए बीजेपी के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि तावड़े के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं, बल्कि बीजेपी के पुराने सामाजिक गठजोड़ को नए रूप में तैयार करने की जिम्मेदारी भी होगी। अमित शाह की 2014 की यूपी रणनीति को बीजेपी की बड़ी सफलताओं में गिना जाता है। उस समय बूथ स्तर के मजबूत नेटवर्क, माइक्रो मैनेजमेंट, डेटा आधारित रणनीति और सामाजिक समीकरणों के बेहतर इस्तेमाल ने पार्टी को बड़ी जीत दिलाई थी। बीजेपी गठबंधन ने 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 73 सीटें जीती थीं और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि इसके बाद पार्टी के प्रदर्शन में धीरे-धीरे गिरावट आई। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें कम हुईं और 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से बेहतर प्रदर्शन किया। ऐसे में विनोद तावड़े की नियुक्ति को बीजेपी की ओर से संगठन और चुनावी मैनेजमेंट पर नए सिरे से फोकस के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। तावड़े के सामने अब बूथ स्तर के कैडर को दोबारा सक्रिय करने, संगठनात्मक बिखराव को रोकने और PDA के मुकाबले एक ऐसा सामाजिक और राजनीतिक एजेंडा तैयार करने की चुनौती होगी जो अलग-अलग वर्गों को बीजेपी के साथ जोड़ सके। उनके लिए यूपी का 2027 विधानसभा चुनाव एक बड़ी अग्निपरीक्षा होगा। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वह बीजेपी को चुनाव जिता पाएंगे या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या वह अमित शाह की तरह उत्तर प्रदेश में ऐसा चुनावी मॉडल तैयार कर पाएंगे जो पार्टी को लंबे समय तक मजबूत स्थिति में बनाए रखे।