जुबान पर काबू रखना क्यों जरूरी है?

जुबान पर काबू रखना क्यों जरूरी है?

📅 September 1, 2026 🏷️ Lifestyle/Motivation ✍️ NewsTime Editorial
इंसान की पहचान सिर्फ उसके काम से नहीं, बल्कि उसकी बातों और व्यवहार से भी होती है। कई बार गुस्से या जल्दबाजी में मुंह से निकले कुछ शब्द रिश्तों को खराब कर देते हैं। बाद में इंसान को अपनी बात पर पछतावा भी होता है, लेकिन तब तक बात काफी आगे बढ़ चुकी होती है। कवि रहीम ने वाणी की इसी ताकत को समझाते हुए बेहद सरल लेकिन गहरी सीख दी है।

रहीम का प्रसिद्ध दोहा है- “रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल, आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥” इस दोहे में रहीम बताते हैं कि हमारी जुबान कई बार बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती है। वह बोलकर तो मुंह के अंदर चली जाती है, लेकिन उसके गलत शब्दों का नुकसान इंसान को खुद झेलना पड़ता है।

1. बोलने से पहले सोचें

इस दोहे का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी भी बात को कहने से पहले उसके परिणाम के बारे में सोचना चाहिए। अक्सर गुस्से में इंसान ऐसी बातें कह देता है, जो सामान्य स्थिति में शायद कभी न कहे। उस समय सामने वाला भले ही चुप रहे, लेकिन शब्द उसके मन में रह सकते हैं। इसलिए विवाद के दौरान तुरंत जवाब देने के बजाय कुछ देर शांत रहना बेहतर होता है।

2. मीठी वाणी का महत्व

मीठा बोलने का मतलब हर बात में सहमत होना नहीं है। इसका अर्थ है कि अपनी बात बिना अपमान और कटु शब्दों के रखी जाए। एक ही बात को सख्त तरीके से कहने पर विवाद हो सकता है, जबकि विनम्र भाषा में कही गई वही बात आसानी से समझी जा सकती है।

3. शब्द रिश्ते बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं

रिश्तों में विश्वास बनाने में काफी समय लगता है, लेकिन एक गलत बात उस विश्वास को चोट पहुंचा सकती है। परिवार हो, दोस्ती हो या काम की जगह, बातचीत का तरीका बहुत मायने रखता है। इसलिए बोलने से पहले यह सोचना जरूरी है कि हमारी बात सामने वाले पर कैसा असर डालेगी।

4. हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं

रहीम की सीख को आज की जिंदगी से जोड़कर देखें तो हर बात का तुरंत जवाब देना जरूरी नहीं है। सोशल मीडिया पर बहस हो या किसी से व्यक्तिगत विवाद, कई बार चुप रहना ही समझदारी होती है। जवाब देने से पहले खुद से पूछना चाहिए कि क्या यह बात कहना जरूरी है और क्या इसे बेहतर तरीके से कहा जा सकता है।

5. गुस्से में शब्दों पर नियंत्रण रखें

गुस्से की स्थिति में इंसान अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो सकता है। ऐसे समय में बोले गए शब्द बाद में पछतावे का कारण बन सकते हैं। इसलिए गुस्सा आने पर कुछ देर शांत रहना, बातचीत को रोक देना और स्थिति सामान्य होने के बाद अपनी बात रखना ज्यादा समझदारी भरा तरीका है।

रहीम की सीख आज भी क्यों जरूरी है?

रहीम के नीति संबंधी दोहों की खासियत यही है कि वे रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बातों को आसान उदाहरणों के जरिए समझाते हैं। उनका यह दोहा हमें याद दिलाता है कि जुबान छोटी जरूर है, लेकिन उसके शब्दों का असर बहुत बड़ा हो सकता है।

इसलिए बोलने से पहले थोड़ा रुकना, सोचकर जवाब देना और सामने वाले का सम्मान बनाए रखना जरूरी है। अच्छी भाषा न सिर्फ रिश्तों को मजबूत करती है, बल्कि हमारे व्यक्तित्व को भी बेहतर बनाती है। कई बार सही समय पर चुप रहना भी एक बड़ी समझदारी होती है।

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