दुनिया तांबे के पीछे, ज्यादा पैसे देने को तैयार!

दुनिया तांबे के पीछे, ज्यादा पैसे देने को तैयार!

📅 August 19, 2026 🏷️ News/Business & Economy
भारत में अगस्त 2026 में कॉपर की कीमत करीब ₹1,400 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है और इसकी कहानी सिर्फ बढ़ती कीमतों की नहीं, बल्कि बढ़ती मांग और सीमित सप्लाई की भी है। दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर बढ़ रही है—इलेक्ट्रिक व्हीकल, सोलर और विंड पावर, पावर ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और AI डेटा सेंटर जैसे सेक्टरों में कॉपर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि कॉपर को अब एनर्जी ट्रांजिशन का नया तेल तक कहा जा रहा है। S&P Global के मुताबिक, ग्लोबल कॉपर डिमांड 2025 के करीब 28 मिलियन टन से बढ़कर 2040 तक लगभग 42 मिलियन टन हो सकती है, यानी करीब 50% की बढ़ोतरी। लेकिन परेशानी यह है कि कॉपर की नई सप्लाई इतनी तेजी से बढ़ाना आसान नहीं है। नई माइन शुरू करने में कई साल लगते हैं, निवेश और सरकारी मंजूरियों की जरूरत होती है और कई पुरानी माइंस में अयस्क की गुणवत्ता भी घट रही है। इसके अलावा कॉपर कंसन्ट्रेट की कमी ने दबाव और बढ़ा दिया है, क्योंकि कंसन्ट्रेट से ही रिफाइंड कॉपर तैयार होता है। जब कंसन्ट्रेट कम होता है तो स्मेल्टर सीमित सप्लाई के लिए ज्यादा भुगतान करते हैं और इसका असर आगे पूरी सप्लाई चेन पर पड़ता है। यही वजह है कि बाजार में खरीदार सिर्फ LME की ग्लोबल कीमत नहीं, बल्कि तुरंत डिलीवरी के लिए अतिरिक्त प्रीमियम भी देने को तैयार हैं। भारत के लिए यह चिंता और बड़ी है, क्योंकि FY25 में देश की कॉपर मांग 9.3% बढ़कर 1.878 मिलियन टन हो गई, जिसमें बिल्डिंग और कंस्ट्रक्शन की हिस्सेदारी करीब 25%, इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन की 19% और इंफ्रास्ट्रक्चर की 17% थी। वहीं सोलर, विंड, EV, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रोलाइजर्स जैसे नए सेक्टरों में कॉपर की खपत FY25 में 32% बढ़ी, हालांकि कुल मांग में इनकी हिस्सेदारी अभी सिर्फ 4.6% है। आने वाले समय में भारत की बढ़ती बिजली मांग, रिन्यूएबल एनर्जी, EV और डेटा सेंटर कॉपर की जरूरत को और बढ़ा सकते हैं। मई 2026 में भारत की पीक बिजली मांग रिकॉर्ड 270.8 GW तक पहुंच चुकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कॉपर की सप्लाई दुनिया की बढ़ती मांग के साथ कदम मिला पाएगी? अगर नहीं, तो आने वाले वर्षों में कॉपर की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है और यह धातु सिर्फ इंडस्ट्री के लिए जरूरी कच्चा माल नहीं, बल्कि दुनिया के इलेक्ट्रिफिकेशन की सबसे अहम और महंगी धातुओं में से एक बन सकती है।

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