बिगड़ रहा रसोई का बजट
चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए 31 अक्टूबर तक ड्यूटी फ्री 10 लाख टन चीनी आयात करने की मंजूरी दी गई है। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट तय की गई है। घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए चीनी मिलों से इस बार 15 अक्टूबर से ही पेराई शुरू करने को कहा गया है, ताकि नई फसल आने के बाद त्योहारी सीजन में पर्याप्त चीनी उपलब्ध हो सके।
चीनी के दाम बढ़ने की वजह को लेकर इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराने की चर्चा भी हुई है, लेकिन सरकार ने इससे इनकार किया है। सरकार का कहना है कि कीमतों में तेजी के पीछे जमाखोरी की आशंका भी एक वजह हो सकती है। इसे रोकने के लिए कारोबारियों के लिए 30 नवंबर तक 400 टन की स्टॉक सीमा तय की गई है।
प्याज की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव 40.79 रुपये प्रति किलो था। एक सप्ताह पहले यह 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये प्रति किलो था। यानी प्याज की कीमत में कुछ ही समय में करीब 4 से 5 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है। कुछ जगहों पर इसकी कीमत 25 फीसदी तक बढ़ी है।
प्याज की कीमत बढ़ने की बड़ी वजह खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी बताई जा रही है। दक्षिण भारत से खरीफ प्याज की आवक देर से हो रही है। वहीं महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में मानसून की देरी से खरीफ प्याज की बुवाई भी प्रभावित हुई है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारने की तैयारी कर रही है।
दालों की कीमतों में भी पिछले एक महीने के दौरान तेजी देखी गई है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी दालों के दाम करीब 1 से 2 रुपये तक बढ़े हैं। दालों की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे मानसून को भी एक कारण माना जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल दलहन की बुआई का रकबा पिछले साल की तुलना में करीब 35 हजार हेक्टेयर कम है। अरहर की बुआई का रकबा भी करीब 1.69 लाख हेक्टेयर कम बताया गया है। ऐसे में मानसून कमजोर रहने की स्थिति में दालों की कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है।
खाने के तेल की कीमतों पर भी अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर पड़ रहा है। पाम ऑयल की कीमतें करीब 20 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। इंडोनेशिया पाम ऑयल का बड़ा उत्पादक है और वहां सूखे की स्थिति के कारण उत्पादन और कीमतों पर असर पड़ा है। भारत खाने के तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है।
सूरजमुखी तेल के आयात में भी कमी देखी जा रही है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के कारण इस क्षेत्र से तेल की आपूर्ति और आयात प्रभावित हुआ है। इसके अलावा वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें भी बढ़ी हैं। पिछले एक महीने में खाने के तेल की कीमतों में करीब 2 से 3 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। सरसों के तेल समेत दूसरे खाद्य तेलों के दाम भी ऊपर गए हैं।
इस तरह चीनी, प्याज, दाल और खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों के रसोई बजट पर दबाव बढ़ा दिया है। सरकार की ओर से आपूर्ति बढ़ाने और जमाखोरी रोकने के कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों का रुख मानसून, घरेलू उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।