दुनिया को कर्ज बांटने वाले सऊदी अरब को क्या हुआ?

दुनिया को कर्ज बांटने वाले सऊदी अरब को क्या हुआ?

📅 September 2, 2026 🏷️ Business ✍️ NewsTime Editorial
सऊदी अरब को भारत में लोग कैसे जानते हैं? अमीर देश, तेल के कुएं, रियाल की करेंसी और पैसा ही पैसा। ऊंची इमारतें, फर्राटा भरती SUV कारें और दुनिया भर में निवेश। खबरों में अक्सर देखने को मिलता है कि जिस देश को पैसों की जरूरत होती है, वह सऊदी अरब की तरफ देखता है। पाकिस्तान भी लंबे समय से सऊदी अरब से आर्थिक मदद और वित्तीय सहयोग लेता रहा है।

लेकिन शेखों के इस मुल्क की तस्वीर अब पूरी तरह गुलाबी नहीं है। सऊदी अरब को खुद बड़े कर्ज की जरूरत पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब करीब 8 अरब डॉलर का भारी-भरकम लोन लेने की तैयारी कर रहा है। 8 अरब डॉलर को भारतीय रुपये में देखें तो यह लगभग 7.6 खरब रुपये के बराबर बैठता है।

दरअसल, ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों और उनके आर्थिक असर ने सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। इसी बीच सऊदी अरब नए लोन के जरिए कम से कम 8 अरब डॉलर जुटाने के लिए शुरुआती बातचीत कर रहा है। देश फंडिंग के अलग-अलग स्रोत तैयार करने की कोशिशें भी तेज कर रहा है।

सऊदी अरब लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक और मध्य पूर्व की बड़ी वित्तीय ताकत रहा है। अपने सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए सऊदी अरब दुनिया भर में निवेश करता रहा है और विकासशील देशों को सहायता तथा कर्ज भी देता रहा है।

अब वही सऊदी बड़े पैमाने पर खुद ऋण जुटाने की कोशिश कर रहा है। इसकी बड़ी वजह क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी विजन 2030 है, जिसे पूरा करने के लिए सऊदी किंगडम को भारी फंडिंग की जरूरत पड़ रही है।

सऊदी अरब का नेशनल डेट मैनेजमेंट सेंटर यानी NDMC कम से कम 8 अरब डॉलर के नए सिंडिकेटेड लोन के लिए बैंकों से बातचीत कर रहा है। सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको भी इसी तरह के फाइनेंसिंग विकल्पों पर चर्चा कर रही है।

ईरान युद्ध से तगड़ा नुकसान

सऊदी अरब को पैसे की जरूरत पैदा होने की एक वजह क्षेत्रीय संघर्ष भी है। ईरान से जुड़े संघर्षों ने तेल निर्यात, व्यापार मार्गों, खासकर होर्मुज स्ट्रेट और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ाया है। इसका असर सऊदी के निर्यात पर पड़ा है।

तेहरान ने सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है, जबकि ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों के लिए खतरा पैदा किया है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से सऊदी तेल की बिक्री प्रभावित हुई, जबकि हूती गतिविधियों के कारण बाब अल-मंदेब मार्ग पर भी जोखिम बढ़ा है।

इस बीच कोरोना महामारी के बाद से दूसरी तिमाही में सऊदी अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट देखने को मिली। इन हमलों की वजह से तेल सेक्टर में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट आई। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत कच्चे तेल की बिक्री ही है।

हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से सऊदी अरब को कुछ राहत भी मिली है। ऊंची तेल कीमतें देश के राजस्व पर पड़ने वाले दबाव को कुछ हद तक कम कर सकती हैं।

इससे पहले 2025 के अंत में NDMC ने 13 अरब डॉलर का सात साल का सिंडिकेटेड लोन जुटाया था। यह रकम बिजली, पानी और सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़ी परियोजनाओं के लिए थी।

2026 की वार्षिक उधार योजना में वित्त मंत्रालय ने करीब 58 अरब डॉलर की कुल फाइनेंसिंग जरूरत बताई है। इसमें लगभग 44 अरब डॉलर का बजट घाटा और करीब 14 अरब डॉलर की कर्ज से जुड़ी जरूरत शामिल है।

सऊदी अरब को इतना पैसा चाहिए क्यों?

सऊदी अरब को इतने बड़े पैमाने पर पैसे की जरूरत की सबसे बड़ी वजह उसका विजन 2030 है। 2016 में मोहम्मद बिन सलमान द्वारा शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य देश की तेल पर निर्भरता कम करना और पर्यटन, मनोरंजन, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स तथा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को मजबूत करना है।

क्राउन प्रिंस सलमान नहीं चाहते कि भविष्य में जब सऊदी की तेल आय घटे तो देश को अचानक आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़े। इसलिए वह समय रहते सऊदी अर्थव्यवस्था को दूसरे क्षेत्रों के लिए खोलना चाहते हैं और तेल के अलावा आय के नए स्रोत तैयार कर रहे हैं।

इस परियोजना को लेकर सऊदी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा काफी बड़ी है। विजन 2030 के तहत NEOM, रेड सी प्रोजेक्ट और क़िद्दिया जैसे कई गीगा-प्रोजेक्ट्स पर सैकड़ों अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। इन योजनाओं में कुल निवेश की जरूरत एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा आंकी गई है।

लेकिन तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और उत्पादन में कटौती ने सऊदी अरब की कमाई को प्रभावित किया है। 2026 की पहली तिमाही में बजट घाटा 33.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इससे सरकार के सामने खर्च और आय के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है।

सऊदी सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारी निवेश कर रहा है। 2024 में सऊदी अरब का रक्षा बजट लगभग 75.8 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि 2025 में यह रकम करीब 78 अरब डॉलर थी। यह सरकारी खर्च का लगभग 21 प्रतिशत और GDP का करीब 7.1 प्रतिशत बताया गया है।

सैन्य, बुनियादी ढांचे और विजन 2030 से जुड़ी विशाल परियोजनाओं पर लगातार बढ़ते खर्च के कारण सऊदी सरकार को ज्यादा पूंजी जुटाने की जरूरत पड़ रही है।

कर्ज का स्तर और जोखिम

सऊदी अरब का सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ रहा है, हालांकि अभी इसे नियंत्रित स्तर पर माना जाता है। 2026 के मध्य तक यह करीब 450 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था। सऊदी का कर्ज-से-GDP अनुपात लगभग 30 से 40 प्रतिशत के आसपास है, जो अमेरिका या कई यूरोपीय देशों की तुलना में काफी कम है।

रेटिंग एजेंसियां जैसे S&P, Fitch और Moody's अभी भी सऊदी अरब की क्रेडिट स्थिति को निवेश ग्रेड श्रेणी में रखती हैं और आउटलुक को स्थिर बताती हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों की चिंता यह है कि लगातार बजट घाटा और भारी उधारी लंबे समय में वित्तीय दबाव बढ़ा सकती है।

एक तरफ सऊदी अरब आज भी विकासशील देशों को सहायता देता है और बुनियादी ढांचे के लिए पैसे उपलब्ध कराता है। दूसरी तरफ वह खुद अंतरराष्ट्रीय बाजारों से बड़ी मात्रा में पूंजी जुटा रहा है। यही विरोधाभास बताता है कि सऊदी अरब का विजन 2030 कितना महंगा प्रोजेक्ट है।

सऊदी अरब के पास अभी भी विशाल तेल संपदा, मजबूत विदेशी निवेश और वित्तीय संसाधन मौजूद हैं। इसलिए इसे तत्काल आर्थिक संकट में फंसा हुआ देश कहना सही नहीं होगा। लेकिन विजन 2030 के लिए जिस गति से खर्च किया जा रहा है, उससे यह साफ है कि सिर्फ तेल की कमाई से इन महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करना आसान नहीं है।

यही वजह है कि दुनिया को कर्ज और आर्थिक मदद देने वाले सऊदी अरब को अब खुद अरबों डॉलर का कर्ज जुटाना पड़ रहा है।

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