वर्मी कंपोस्ट से खड़ा किया करोड़ों का कारोबार
कोरोना से पहले हृदेश आईटी सेक्टर में नौकरी करते थे। नौकरी और दूसरे निवेशों से उनकी सालाना कमाई करीब 12 लाख रुपये तक पहुंच गई थी। उनके पार्टनर अभिषेक विश्वकर्मा दिल्ली में सैमसंग कंपनी में काम करते थे और उनका सालाना पैकेज करीब 25 लाख रुपये था। साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान हृदेश ने किसानों को मुश्किल परिस्थितियों में भी लगातार खेती करते देखा। इसी दौरान उनके मन में कृषि से संबंधित कारोबार शुरू करने का विचार आया।
वर्मी कंपोस्ट बनाने वाले एक परिचित से हृदेश और अभिषेक को इस कारोबार की शुरुआती जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने स्थानीय स्तर पर लोगों से बातचीत की और खाद तैयार करने की प्रक्रिया समझी। दोनों ने YouTube वीडियो के जरिए वर्मी कंपोस्टिंग की तकनीक और जरूरी सावधानियां सीखीं। शुरुआत में उन्होंने छोटे स्तर पर खुद खाद तैयार की।
इसी दौरान उन्हें पता चला कि कई किसान वर्मी कंपोस्ट तैयार तो कर रहे हैं, लेकिन उनके पास तैयार खाद बेचने के लिए उचित बाजार नहीं है। यहीं से हृदेश और अभिषेक ने अपने कारोबार का मॉडल बदल दिया। उन्होंने ऐसे किसानों से तैयार वर्मी कंपोस्ट खरीदना शुरू किया, जिनके पास खाद बेचने के लिए बाजार नहीं था। इससे किसानों को अपनी उपज का खरीदार मिला और कंपनी को लगातार तैयार खाद की सप्लाई मिलने लगी।
धीरे-धीरे उनका किसान नेटवर्क बढ़ता गया। आज जबलपुर के अलावा नागपुर और नीमच क्षेत्र के करीब 26-27 किसान उनके साथ जुड़े हुए हैं। किसानों से खरीदी गई खाद की गुणवत्ता की जांच के बाद उसे अलग-अलग ग्राहकों और बाजारों तक पहुंचाया जाता है। किसानों के उत्पादन को मिलाकर सालाना 6 हजार टन से ज्यादा वर्मी कंपोस्ट का कारोबार होता है। उत्पादन मौसम और कच्चे माल की उपलब्धता के अनुसार कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन किसानों द्वारा सालभर तैयार की गई खाद को कंपनी खरीदती है।
इस मॉडल से किसानों को अपनी खाद बेचने के लिए अलग से बाजार तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती। वहीं कंपनी को भी लगातार वर्मी कंपोस्ट की सप्लाई मिलती रहती है। किसान और कंपनी के बीच बनी यह साझेदारी आज उनके कारोबार की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।
जबलपुर से शुरू हुआ यह कारोबार अब मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। हृदेश और अभिषेक की वर्मी कंपोस्ट की सप्लाई राजस्थान, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और जम्मू-कश्मीर समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में की जा रही है। कई कंपनियों और संस्थानों को भी खाद की आपूर्ति की जा चुकी है।
शुरुआत में हृदेश ने अपना प्लांट लगाकर खाद तैयार की थी, लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि किसानों को साथ लेकर कारोबार को ज्यादा बड़े स्तर तक पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने खुद उत्पादन बढ़ाने के बजाय किसानों से तैयार खाद खरीदने का मॉडल अपनाया। कंपनी किसानों से खाद खरीदने के बाद उसकी गुणवत्ता और निर्धारित मानकों की जांच करती है और मानकों पर खरी उतरने वाली खाद को ही बाजार में भेजा जाता है।
वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए एसेनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुओं का इस्तेमाल किया जाता है। कारोबार को विस्तार देने के लिए वर्ष 2022 में हृदेश ने IDBI बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण लिया। यह ऋण CGTMSE योजना के तहत लिया गया था। इसी साल हृदेश और अभिषेक ने ‘केंचुआ ऑर्गेनिक प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से कंपनी भी रजिस्टर्ड कराई।
शुरुआत में हृदेश का कार्यालय आधारताल क्षेत्र में था, लेकिन कारोबार बढ़ने के साथ ज्यादातर ऑर्डर फोन पर मिलने लगे। अब उन्होंने कार्यालय बंद कर दिया है और घर से ही कारोबार का संचालन कर रहे हैं। उनके मुताबिक करीब 90 प्रतिशत ऑर्डर फोन पर मिल जाते हैं।
आज कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 1.5 करोड़ रुपये है और इससे करीब 20-25 लाख रुपये की सालाना बचत होने की बात बताई गई है। हृदेश की सफलता की खास बात यह है कि उन्होंने अपने कारोबार के साथ किसानों को भी जोड़ा और उनके लिए तैयार वर्मी कंपोस्ट बेचने का बाजार उपलब्ध कराया।
हृदेश की कहानी बताती है कि कृषि सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है। सही तकनीक, बाजार की समझ और किसानों के साथ मिलकर काम करने का मॉडल अपनाकर कृषि से जुड़ा कारोबार भी बड़े स्तर पर खड़ा किया जा सकता है। नौकरी छोड़कर चुना गया यह रास्ता आज उनके लिए कमाई का जरिया बनने के साथ कई किसानों को उनकी तैयार वर्मी कंपोस्ट के लिए बाजार भी उपलब्ध करा रहा है।